वक्त के साथ बदलती साक्षरता की परिभाषा…

ऐसा माना जाता है कि अधिकतर सामाजिक समस्याओं की जड़ निरक्षरता है। साक्षरता के अभाव में किसी भी देश का विकास भी संभव नहीं हो सकता है। इसलिए साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए यूनेस्को हर साल 8 सितंबर के दिन को “अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस” के रूप में मनाता है। जिसकी शुरुआत यूनेस्को द्वारा 17 नवंबर 1965 से की गई थी। विश्वभर में निरक्षता को मिटाने के मकसद से यह अभियान शुरू किया गया और संकल्प लिया गया था कि किसी भी देश में 1990 तक कोई भी व्यक्ति निरक्षर नहीं रहेगा। यह अभियान 1995 तक ऐसे देशों में चलाया गया जो इसमें पिछड़े हुए थे, जिसमें भारत भी शामिल है। आज़ादी के समय जिस भारत की साक्षरता दर 12% थी वो आज बढ़ कर 74.40% तक पहुंच चुकी है।

साक्षरता के माध्यम से कोई भी देश गरीबी, बाल मृत्यु दर , जनसंख्या वृद्धि, प्रदुषण जैसी कई समस्याओं को जड़ से समाप्त कर सकता है। साक्षरता में वो क्षमता है जो किसी भी परिवार और देश की प्रतिष्ठा को बढ़ा सकता है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या पढ़ लिख कर डिग्री हासिल करना ही साक्षरता की निशानी है? क्या बिना डिग्री के ज्ञान का कोई मोल नहीं हैं? 38.6% लोग ऐसे हैं जिनके पास डिग्री फलाने क्षेत्र की है और वो नौकरी दूसरे क्षेत्र में करते हैं। उदाहरण के लिए हमनें अपने चार साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई में दिए, डिग्री भी हासिल कर ली लेकिन जब अपना मूल्यांकन करने बैठे तो पता चला हम इस क्षेत्र में फिट नहीं बैठ पा रहे हैं,हम साक्षर तो हो रहे हैं लेकिन समय की मांग के अनुसार हमें उस कुशलता की जरूरत है जो आज की नौकरी के लिए जरूरी हो गई है। सोचिए, ऐसी डिग्रियों का क्या लाभ जो छात्रों को उनकी डिग्री के अनुसार नौकरी नहीं दिला सकती हैं? भारत में ऐसे लोगों की कमी नहीं हैं जिनके पास नौकरियाँ तो हैं लेकिन उस क्षेत्र का ज्ञान नहीं और जिनके पास ज्ञान हैं उनके पास नौकरियाँ नहीं।

विश्व को सौ फीसदी साक्षरता दर हासिल करने में अभी वक्त है लेकिन भविष्य में एक समय ऐसा आएगा जब साक्षरता की परिभाषा पूरी तरह से बदल जाएगी। आने वाले भविष्य में लोगों के पास उस दौर के हिसाब से ज्ञान और कौशल नहीं होगा तो वे लोग साक्षर नहीं कहलाएंगे। इसलिए ज़रूरत है लोगों को आज से ही नए-नए कौशल सीखने होंगे तभी हम दूसरे देशों का मुकाबला कर सकते हैं और नए तकनीकों को खुद पर हावी होने से बचा सकते हैं।हम सभी को उम्मीद है,भारत की नई शिक्षा नीति हमें साक्षर होने के साथ कुशलता के वो सभी गुण सिखाएगी जो आने वाले वक्त की मांग को पूरा करेंगे।

लेखिका मुस्कान सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय की छात्रा हैं ।

* इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। यह जरूरी नहीं है कि मंथन न्यूज़ 24 लेखक से सहमत हो । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है ।