मेरे गुरु……

मेरे गुरु……
गुरु अथार्त् जो हमें जीवन में ज्ञान की अनुभूति कराता है तथा हमें इस दुनिया में जीने के तौर तरीकांे से रूबरू कराता है। माता पिता को छोड़ कर वो गुरु ही होता है जो निः स्वार्थ भाव से आपका भला चाहता है। माना गया है की हर शिशु की प्रथम गुरु उसकी माँ ही होती है इसीलिए प्रत्येक शिक्षक दिवस को सर्वप्रथम अपनी माँ को ही बधाई दें और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें। माँ के उपरांत गुरु को ईश्वर की संज्ञा दी गयी है। गुरु अपने शिष्य को ज्ञानर्जन के लिए ही दंडित करता है परंतु हम शिक्षा ग्रहण करते समय किशोरावस्था में होते हैं और इस उम्र हमसे कोई जरा भी गुस्से में बोल दे तो उसे हम अपना दुश्मन समझ बैठतै हैं। जबकि प्रत्येक गुरु चाहता है की उसके अधीनस्थ अध्यनरत छात्र उससे भी बेहतर बने।
इसीलिए तो गुरु के विषय में कहा गया है-

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वराय।
गुरुर साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

जिक्र अगर गुरु का हो और स्कूल के शिक्षक याद ना आये ऐसा हो नहीं सकता, नरसिंहपुर जिले के शिक्षा के मंदिर की बात है, जी हॉ, शिक्षा का मंदिर श्री नरसिंह पब्लिक स्कूल जिसके संचालक है मेरे प्रिय गुरु श्री संजय नेमा जी। आज स्कूल संचालक होने के वावजूद भी वह कक्षाएँ लेते हैं । उनके कक्षा में प्रवेश करते ही हमारे मन मे सकारात्मक विचार घर करने लगते हैं। महोदय कक्षा में प्रवेश करते ही जुते उतारकर धरती माँ का वंदन करते हैं । उसके बाद सभी बच्चे को एक आवाज आती है स्टैंड अप एंड क्लोज योर आईज ।…..
तदुपरान्त गणेश स्तुति…..
‘‘वक्रतुण्ड महाकाय…..‘‘

माता रानी का जयकारा लगाते हुए क्लास की शुरुआत होती है। महोदय जी को लगभग कक्षा के सभी छात्रों के मोबाइल नंबर कण्ठस्थ है। कभी-कभी छात्र छात्राओं को उनके नाम के स्थान पर उनके नंबर से पुकारा जाता है। इस स्कूल में मुझे हमेशा घर जैसा महौल मिला। शुरुआत में स्कूल के बहुत से नियम कायदे मुझे अटपटे लगे लेकिन समय के साथ उनके सकारात्मक परिणामों ने मेरी विचारधारा में परिवर्तन ला दिया। स्कूल में दो पहिया वाहन से आना पूर्णतः वर्जित था। संचालक महोदय के कथनानुसार सायकल चलाने से शारीरिक स्वस्थता आती है। इस स्कूल का एक और मनोरंजक हिस्सा है, यहॉ का गणेश महोत्सव। विद्यालय में गणेश जी की प्रतिमा हर वर्ष स्थापित होती है और आरती सारे विद्यालय के छात्र एवं शिक्षक मिल कर करते हैं आरती के बाद संचालक महोदय खुद भक्ति गीतों पर विद्यार्थियों के साथ थिरकते हैं । हमारा मानना है की इस स्कूल में आकर विद्यार्थी का संपूर्ण विकास होता है। आज मैं माखनलाल विश्वविद्यालय भोपाल में अध्यनरत हूँ और बड़ा खुश भी हूँ कि इस उत्कृष्ठ संस्थान का मैं भी एक हिस्सा हूँ। पर आज भी कहीं ना कहीं दुःख है अपने विद्यालय से अलग होने का। कुछ चीजों का एहसास और उनकी जरूरत हमें उस दौर के गुजर जाने के बाद ही पता चलती हैं।
गुरु के परिपेक्ष्य में। कहा गया है—

गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूँ पाय ।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।

विद्यार्थी जीवन चुनौतियों से परिपूर्ण होता है और इन चुनौतियों को पार कर हमें सफल बनना होता है ओर इस कठोर पथ पर आपके गुरु सदैव कृष्ण की भांति आपका मार्गदर्शन करते हैं। गुरु ही एक बेहतर सुसंस्कारी व्यक्तित्व वाले मनुष्य का निर्माण कर सकता है ओर एक उत्कृष्ट सोच बाला मनुष्य ही बेहतर समाज की कल्पना। अतः गुरु ही एक संस्कारित समाज का निर्माणकर्ता है। आप अपने गुरु का सदैव आदर करे उन्हें सम्मान दें ।

@ ऋषभ जाट

इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। यह जरूरी नहीं है कि मंथन न्यूज़ 24 लेखक से सहमत हो । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है ।