सांस्कृतिक-स्वतंत्रता का मंगल-प्रभात है यह दिन

भारतवर्ष के संघर्षशील इतिहास में आज का दिन दूसरा स्वतंत्रता दिवस है। स्वतंत्रता केवल राजनीतिक विषय मात्र नहीं है, उससे कहीं आगे धार्मिक-सांस्कृतिक भाव-बोध भी है। इसीलिए आक्रामक शक्तियां किसी देश पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के तत्काल पश्चात उस देश की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने, उनकी परंपराओं और विश्वासों को समाप्त कर उन्हें अपने मतानुरुप ढालने का कुचक्र रचती हैं। भारत ने विगत 1000 वर्ष से भी अधिक लंबे संघर्ष में इस कठोर सत्य का सामना किया है, हर स्तर पर हर संभव बलिदान दिया है और अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक चेतना का संरक्षण किया है। इन्हीं महान बलिदानों का सुफल आज भगवान श्री राम की जन्मभूमि पर बनने जा रहे मंदिर के रूप में प्राप्त हो रहा है। अतः आज का दिन भारतवर्ष के लिए सांस्कृतिक स्वाधीनता दिवस है।

       स्वतंत्रता त्याग और बलिदान मांगती है। अट्ठारह सौ सत्तावन से लेकर 1947 तक 90 वर्ष चलने वाले अनवरत राजनीतिक संघर्ष ने हमें राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र किया किंतु सांस्कृतिक स्वतंत्रता का यह संग्राम अयोध्या की धरती पर 500 वर्ष से अधिक समय तक लड़ा गया है। यहां तक कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इस संघर्ष ने धर्मप्राण रामभक्तों के असंख्य जीवन लिए हैं। सन 1527-28 में आक्रांता बाबर के सेनापति मीरबाकी द्वारा बलपूर्वक मंदिर ढहाए जाने और उस स्थान पर तथाकथित मस्जिद बनाए जाने से लेकर 2 नवंबर, 1990 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में निहत्थे रामभक्त कारसेवकों पर गोली चलाए जाने तक की यह बलिदान गाथा लाखों हिंदुओं की सांस्कृतिक स्वतंत्रता प्रियता की साक्षी है।

       राजनीतिक संघर्ष केवल सत्ता की प्राप्ति के लिए होते हैं और उनमें प्रायः भाड़े के सैनिक अपने आकाओं के आदेश पर वेतन के लिए युद्ध करते हैं किंतु सांस्कृतिक संघर्ष की चेतना स्वतः-स्फूर्त होती है। उसमें आत्मप्रेरणा से योद्धा विजय अथवा आत्म बलिदान के लिए स्वयं को सहर्ष  प्रस्तुत करता है। रामजन्मभूमि के संघर्ष में भी यही बात सामने आती है। मंदिर की रक्षा और मंदिर-ध्वंस के उपरांत उस भूमि की प्राप्ति के लिए राजाओं से लेकर साधारण ग्रामीणों तक ने बलिदान दिए। पुरोहितों, पुजारियों और संतों ने बार-बार असफल होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और धर्मयुद्ध की इस पावन ज्वाला में स्वयं को संमिधा बनाकर निरंतर अर्पित करते रहे।

        मंदिर की सुरक्षा के लिए प्रथम संग्राम मीरबाकी और भीटी नरेश मेहताब सिंह के मध्य 70 दिन तक जारी रहा। मीरबाकी की 450000 सेना में केवल 3145 सैनिक जीवित बचे जबकि 174000 रामभक्त योद्धाओं सहित राजा मेहताब सिंह ने वीरगति पाई। रामभक्तों की लाशों के ढेर को पारकर मीरबाकी ने तोपों से मंदिर ध्वस्त किया किंतु मंदिर की भूमि पुनः प्राप्त करने के लिए पुरोहित देवीदीन ने आस-पास के गांव से 90000 ग्रामीण रणबांकुरे एकत्र कर 3 जून, 1518 को मुगल सेना पर भीषण आक्रमण किया। सात दिन चले इस युद्ध में 9 जून, 1518 को दोपहर 2:00 बजे देवीदीन साथियों सहित वीरगति को प्राप्त हुए। संघर्ष थम-सा गया किंतु लगभग 15 दिन बाद हंसवर नरेश रणविजय सिंह ने अपने 25000 सैनिक लेकर 10 दिन तक युद्ध कर वीरगति पाई। उनकी रानी जयकुमारी ने अपनी तीन हजार नारी सेना और गुरु महेश्वरानंद की 24000 संन्यासी सेना के सहयोग से हुमायूं के समय तक छापामार युद्ध करते हुए अनेक बार जन्मभूमि की मुक्ति के स्वप्न को साकार किया किंतु शाही सेना ने उस पर फिर कब्जा कर लिया।

       अकबर के समय में स्वामी बलरामपुरी ने 20 बार आक्रमण कर जन्मस्थान को 15 बार मुक्त कराया। औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु रामदास के शिष्य बाबा वैष्णव दास ने चिमटाधारी साधुओं की सेना बना कर स्थानीय क्षत्रियों और गुरु गोविंद सिंह की सैन्य सहायता से शाही सेना को पराजित किया किंतु 1664 में जन्मभूमि फिर हाथ से निकल गई। फैजाबाद गजेटियर के अनुसार 1853 में नवाब वाजिदअली शाह के समय में दो दिन के संघर्ष में हजारों रामभक्त शहीद हुए। 1857 की क्रांति के समय बाबा रामचरण दास और मौलवी आमिरअली में जन्मस्थान हिंदुओं को सौंपने की सहमति बनी किंतु 18 मार्च, 1858 को अंग्रेजों ने दोनों को एक साथ फांसी दे दी।

        19 जनवरी, 1885 को ब्रिटिश शासनकाल में महंत रघुवर दास ने फैजाबाद न्यायालय से नया संवैधानिक संघर्ष प्रारंभ किया जो अनंत बाधाओं को पार करता हुआ 09 नवंबर, 2019 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय से समाप्त हो गया किंतु इस अवधि में भी रामभक्तों को अपनी अधिकार प्राप्ति के लिए प्राण देने पड़े। 2 नवंबर, 1990 को मुलायम सिंह यादव के शासन में निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलायी गई। सैकड़ों रामभक्तों को स्वतंत्र भारत की चुनी हुई सरकार की छाया में भी अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

        सांस्कृतिक स्वतंत्रता और भारतीय अस्मिता की रक्षा के लिए होने वाले इस लंबे संघर्ष की कालरात्रि बीतने के उपरांत आज भूमिपूजन की शुभ घड़ी आई है। प्रसन्नता का यह अवसर रामजन्मभूमि के लिए प्राण-अर्पण करने वाले लाखों वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का भी पुण्य-क्षण है। उनका महत्व राजनीतिक स्वाधीनता के लिए मर मिटने वालों से कम नहीं है।