वो गीतकार जिसने पांच दशकों तक इंडस्ट्री पर राज़ किया।

ज़िन्दगी जब शब्दों की शक़्ल में उतरती है तो वो गीत बनकर गूंजते है सालों, दशकों और सदियों तक।आज ऐसे ही गीतकार का जन्मदिन है। जिसने 4 हज़ार से ज्यादा गीत लिखे। 40 बार फ़िल्मफ़ेयर के लिए चुने गए।

उस समय जब गीतकार गीत लिखने के लिए 8 दिन मांगते थे तब आनंद बक्शी 8 मिनट में गीत लिख देते थे। 1960 से लेकर 2000 तक गीतकार आते जाते रहे लेकिन आनंद टिके रहे ।

साल 1956 फ़िल्म भला आदमी से उन्हें पहला ब्रेक मिला फ़िल्म के लिए उन्होंने चार गीत लिखे। फ़िल्म नहीं चली लेकिन आनंद की गाड़ी निकल पड़ी। उनके गीत ज़ुबाँ पर छाने लगे।

1965 में आनंद बख्शी के करियर ने एक बड़ी करवट ली. इसी साल उनकी दो फिल्में आई थीं-हिमालय की गोद में और जब-जब फूल खिले. इन दोनों फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को अचानक ही आसमान पर पहुंचा दिया।

मैं तो एक ख्वाब हूं से लेकर परदेसियों से न अखियां मिलाना जैसे गाने हर जुबां की पसंद बन गए. इसके बाद तो आराधना, कटी पतंग, शोले, अमर अकबर एंथनी, हरे रामा हरे कृष्णा, कर्मा, खलनायक, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, ताल, गदर-एक प्रेमकथा के लिए गीत लिखे।

उनका सफर चलता रहा। वो वक़्त को लेकर लिखते थे। ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते। जब कोई तंज कसता तो उन्होंने लिखा कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना।

फिर तो ज़रा तस्वीर से निकलकर सामने आ मेरी महबूबा से इश्क़ बिना क्या जीना यारों, इश्क़ बिना क्या मरना यारों। ये गीत 20वी सदी को अलविदा कर हमें 21वी सदी में धकेल रहे थे।

उनका इश्क़ सिगरेट था। इसी इश्क़ ने उनकी ज़िंदगी छीन ली। 2002 में फेफड़ों के इन्फेक्शन की वजह से उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। और उनके गीतों ने उन्हें अमर कर दिया जन्म जन्मांतर तक।

@आशीष विश्वकर्मा

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