बेरोजगार की अधूरी प्रेम कहानी

देखा था उसे एक चैरिटेबल ट्रस्ट में, मेरी ही तरह एक ट्रेनी थी,
बात हुई दोस्त बने, फिर छः महीने बाद अजनबी हो गए।
फेसबुक ने भी अलग ही फ़र्ज़ अदा किया, साथ तो दिया,
पर हम दोस्त ही थे तब तक, उससे आगे बढ़ने ना दिया।

अक्सर हाल चाल ले लेते, सुबह शाम खाने की चर्चाएं भी होती रहती,
फिर रास्ते अलग हो गए, वो अलग चली गई और हम भी ज़िन्दगी में मस्त हो गए। पांच साल बाद मुझे उसके क़दमों की आहट फिर सुनाई पड़ी,पता लगा कि वॉट्सएप के जरिए, उसने फिर मेरी ज़िन्दगी में फिर दस्तक दी।

तब मेरे दिल में उसके लिए, प्रेम का एक फ़ूल खिला,
अपने मन की बात उसके सामने बोलने से कैसे पीछे हटता।
दिल तो बेचारा मेरा बच्चा ही था, तभी तो उससे मिलने मैं दिल्ली तक जा पहुंचा।

उसको देखा तो बस देखता ही रहा, वो लाल दुपट्टा खुले बाल,
दिल मेरा बोला भर ले आंखो में, यार तेरा सुंदरता की मिसाल।
उस दिन पहली बार मैंने, साथ उसके कुछ पल बिताए थे।
साथ दोनों ने बैठकर, चांदनी चौक के पराठे खाए थे।

हाथ पकड़ कर उसका मैंने, कह दी अपने दिल कि बात,
वो भी शरमाते हुए बोली, हां मैं दूंगी तुम्हारा ज़िन्दगी भर साथ।
सब तो ठीक चल रहा था, मेरे घर वाले भी शादी के लिए थे तैयार,
उसने भी मेरे बारे में, घर में कर ली थी हर एक बात।

पर उसके पिताजी ने रखी उसके सामने एक बात,
कैसे खुश रखेगा वो तुम्हें, लड़का तो है बेरोजगार।
वो रोती रही गिड़गिड़ाती रही, मैंने भी सबको मनाने की हर मुमकिन कोशिश करी, पर वो पत्थर से भी मज़बूत, अपनी बात पर अड़े रहे।

फिर क्या होना था दोस्तों, नहीं कह पाई वो आगे इसके कुछ,
अपने पिताजी की मर्ज़ी से बन गई वो किसी और की।
आंखो के आंसू छुपाए, तड़पता रहा गया यादों में उसकी,
जुदा सबसे था रहता मैं, साथ रहती थी तो बस बातें उसकी।

उस दिन अहसास हुआ कि लड़के के लिए नौकरी है पहले ज़रूरी,
प्यार को दुनिया नहीं समझ सकती, लड़के की हैसियत है पहले ज़रूरी।

शैली शर्मा

इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। यह जरूरी नहीं है कि मंथन न्यूज़ 24 लेखक से सहमत हो । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है ।