महामारी और साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

शासकीय कला वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय सुखतवा द्वारा
दिनांक 29 जुलाई को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शीर्षक था “महामारी और साहित्य”। समाज में आए संकट और साहित्य के विशेष संदर्भ में इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया। ऑनलाइन आयोजित इस संगोष्ठी में निम्नांकित वक्ताओं ने इस प्रकार विचार व्यक्त किए-

प्राचार्य डॉ. एल.एन. पाराशर ने अपने स्वागत उद्धबोधन में साहित्य का मानव जीवन में क्या महत्व है और कैसे किसी के लिए साहित्य
आवश्यक है यह बताया। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी का विषय अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने महामारी के अनेक पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए।

डॉ. शीला ठाकुर जो इस कार्यक्रम की संयोजक थी उन्होंने सभी अतिथियों का परिचय दिया और अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने भूतकाल में संसार में आई कोलेरा, चेचक, मलेरिया और अन्य महामारी जिनका हमारे साहित्य में वर्णन है उसके बारे में बताया। उन्होंने साहित्यकार के कर्तव्य को भी दर्शाया। जहां आज के समय में लोग आत्महत्या करने को मजबूर हैं ऐसे समय में एक साहित्यकार अपनी रचनाओं के द्वारा लोगों को अभी प्रेरित कर कठिन समय से बाहर लाने का प्रयास करता है।

श्री पवन अग्रवाल जी इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता थे उन्होंने बताया कि प्राकृतिक आपदा और महामारी में क्या अंतर है। उन्होंने बताया कि कैसे प्राचीन काल में इन महामारियों को ईश्वर का प्रकोप बताया जाता था। कोरोना और प्लेग मैं क्या समानता है और आपने यह कामना कर जिस प्रकार प्लेग अगस्त-सितंबर तक अपने चरम पर था और दिसंबर तक लगभग खत्म हो गया ऐसे ही यह महामारी खत्म हो जाए। 1918 में जब स्पेनिश फ्लू आया था तब भी भारत में लगभग दो करोड़ जाने गई थीं। उन्होंने बड़ी ही रचनात्मक तरीके से बताया कक एक छींक आने पर भी हम कैसे औषधी लेने जा रहे हैं और अपने रिश्तेदारों से दूर भाग रहे हैं। उन्होंने बहुत ही सार रूप में अपना उद्धबोधन दिया।

डॉ. धमेंद्र पारे जो अतिथि वक्ता थे उन्होंने बताया कि साहित्य समाज की छवि, धड़कन, उसकी चाल, हलचल और उसमें चीजों को भी अंकित करता है। वह समाज का दर्पण है। आपने लोक संस्कृति पर भी प्रकाश डाला।

डॉ. दीपा दत्तात्रय कुचेकर ने अपनी बात बहुत ही सौमयता और शालीनता से प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार अलग-अलग
महामारी अलग-अलग स्वरूप में आकर मानव जीवन के धरातल को हिला देती हैं, परंतु हम इन बीमारियों से लड़ कर विजय प्राप्त करते हैं। एक साहित्यकार कैसे मानव जीवन में घटित संवेदना को अपनी रचनाओं में डालता है और निश्चित ही इस महामारी के कारण नया संदर्भ हमारे साहित्य में जुड़ेगा।

डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र इस कार्यक्रम के अध्यक्ष थे। उन्होंने अपने अनुमोदन में कहा कि साहित्यकार के पास ज्ञान की तीसरी आंख होती है जिससे वह उन संवेदना से आगे बढ़ता है और अपनी रचनाओं से हमारे मन को छूता है।

डॉ. ओ.एन. चौबे इस संगोष्ट्ठी के विशिष्ट अतिथि थे । उन्होंने बड़ी ही
सरलता और सहजता से अपनी बात रखी। उन्होंने पत्रकार और साहित्यकार में अंतर को बताया और बताया कि किस प्रकार साहित्यकार घटना को देखता है और फिर उसे अपनी रचनाओं में व्यक्त करता है। इस महामारी के आने से प्रकृति के देवता ने अपने आप को स्वच्छ कर लिया है।

श्रीमती मधु तलरेजा ने संगोष्ठी सार प्रस्तुत करते हुए बताया कि वर्चुअल सेमिनार में यूट्यूब आदि माध्यमों से मध्यप्रदेश के अतिरिक्त दिल्ली, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, असम आदि अनेक प्रांतों के हिंदी-प्रेमी और शोधार्थी लाभान्वित हुए। सभी विद्वानों के वक्तव्य का सार प्रस्तुत करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि किस प्रकार इस महामारी में मिले समय का सदुपयोग कर हम लाभांवित हुए।

डॉ. मंजू मालवीय ने विद्वान वक्ताओं का आभार व्यक्त करने से पूर्व संगोष्ठी के विषय की आवश्यकता प्रतिपादित की। उन्होंने प्राचार्य एल.एन पराशर, डॉ. शीला ठाकुर संगोष्ठी की संचालिका, मुख्य वक्ता श्री पवन अग्रवाल, अतिथि वक्ता डॉ. धर्मेंद्र पारे, डॉ. दीपा दत्तात्रेय, कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र, विशिष्ट अतिथि एवं मुख्य अतिथि डॉ. ओ.एन. चौबे, श्रीमती मधु तलरेजा संगोष्ठी सार प्रस्तुतिकरण, आयोजन सचिव डॉ. हिमांशु चौरसिया, आयोजन समिति सौरभ तिवारी, रेखा चौबे, रश्मि तिवारी, मीना कीर उन समस्त लोगों को आभार प्रस्तुत किया जिन्होंने संगोष्ठी को सफल बनाने में अपना योगदान दिया।