क्या वाकई में सशक्त हो रही हैं महिलाएं ?

हर साल 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन सालों से महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य हर लिंग, आयु, जाति, नस्ल, धर्म और देश के लोगों को एक साथ लाने और एक समान दुनिया बनाना है।

इसे पहली बार अमरिका में 28 फरवरी 1909 को मनाया गया था। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड ने 19 मार्च 1911 को विश्व स्तर पर महिला दिवस के रूप में स्थापित किया गया था। बता दे कि संयुक्त राष्ट्र ने इसे पहली बार 1975 में मनाया था। फिर उन्होंने 1977 में एक प्रस्ताव पारित कर महिलाओं के अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र दिवस घोषित कर दिया दिया था।

हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाये जाने की एक वार्षिक थीम तय की जाती है लेकिन पहले ऐसा नहीं होता था। वार्षिक थीम रखने की प्रथा पहली बार 1996 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा शुरू की गई थी। साल 2021 की थीम है ‘नेतृत्व(leadership) में महिला: COVID-19 के दौर में दुनिया में एक समान भविष्य को प्राप्त करना’। लेकिन क्या सच में महिलाओं को उनकी अहमियत बताने के लिए उनका शुक्रिया अदा करने के लिए साल के 365 दिनों में से सिर्फ एक दिन पर्याप्त है? सालों से महिलाएं खुद को समाज के सामने साबित करती आ रही है, हम क्यों नहीं मान लेते की महिलाएं किसी से भी किसी भी तरह से कम नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र की महिला कार्यकारी निदेशक फुमजिले म्लाम्बो-न्गुका ने कहा था ‘दुनिया में इस समय समानता नहीं है और महिलाएं आज भी बदलाव के लिए मौलिक रूप से अधीर है’। क्योंकि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है। आकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में महिलाएं असमानता का शिकार होती रहती हैं, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं जैसे जबरन शादी, लिंग आधारित हिंसा, सेक्सिस्ट नीतियां, साथ ही शिक्षा और रोज़गार जैसी कई मौलिक अधिकारों से वंचित रहती है। अगर हम बात करे अधिक पैसों वाले अवसरों की तो सिर्फ 38% ही महिलाएं ऐसी है जो इनका लाभ ले पाती है। विकास के लक्ष्य को पूरा करने, मानवीय पीड़ा को कम करने और हमारी सबसे बड़ी पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं का हल खोजने के लिए विश्व स्तर पर लिंग समानता हासिल करना बेहद जरूरी है।

अल गोर, संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा था “जनसंख्या वृद्धि पृथ्वी के संसाधनों को टूटने के बिंदु पर ला रही है, और लड़कियों को शिक्षित करना इसे स्थिर करने में सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

लेकिन आज भी कई घरों में महिलाओं को वो सम्मान नहीं मिल पाता है जिनकी वो हकदार हैं। महिलाएं सब कुछ नज़रअंदाज कर सकती है,यहा तक कि वो खुद को भी अनदेखा कर देती है लेकिन कभी अपने परिवार को उनसे जुड़ी किसी भी चीज़ को नज़रअंदाज नहीं करती। यह कहना गलत नहीं होगा कि महिलाएं अपने घरों का वो मजबूत स्तंभ होती है जिसे अगर कुछ हो जाए तो इमारत रूपी परिवार ढह जाता है।

लेकिन फिर भी महिलाओं के प्रति होने वाले हिंसा दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। इसमे गलती किसकी है सरकार की या पौरुष वादी सोच रखने वाले समाज की? आज हमे यह समझने की ज़रूरत है कि सिर्फ सोशल मीडिया पर एक दिन की मुबारकबाद देने या जागरुकता फैलाने से हम महिलाओं को वो सम्मान नहीं दिला सकते जिनकी वो हकदार है। ज़रूरत है तो खुद के घरों से हर दिन इसकी शुरुआत करने की और उन सभी महिलाओं पर गर्व महसूस करने की जिन्होंने अपने-अपने स्थानों पर एक मुकाम हासिल किया है और अन्य महिलाओं को कुछ कर गुज़रने के लिए प्रेरित किया है।

लेखिका मुस्कान सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय की छात्रा हैं ।